आचार्य डॉ. निलिम्प त्रिपाठी ने बताया आदिशक्ति की महिमा और त्रिशक्ति का दिव्य रहस्य
ज्ञानयज्ञ के तीसरे दिन का प्रमुख आकर्षण मणि द्वीप की दिव्य कथा रही।

द क्लिफ़ न्यूज़, भोपाल
महर्षि महेश योगी संस्थान के महर्षि उत्सव भवन में आयोजित भव्य श्रीमद् देवी भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ के तीसरे दिन मां आदिशक्ति की महिमा, मणि द्वीप में श्री भुवनेश्वरी देवी के प्राकट्य और त्रिशक्ति के दिव्य स्वरूप का भावपूर्ण वर्णन किया गया। कथा व्यास आचार्य डॉ. निलिम्प त्रिपाठी जी ने देवी भागवत महापुराण के प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को शक्ति उपासना के आध्यात्मिक महत्व से परिचित कराया। उन्होंने मां भगवती की कृपा, देवी तत्त्व की व्यापकता और सृष्टि के संचालन में आदिशक्ति की भूमिका को विस्तार से समझाया। कथा के दौरान देवी के विभिन्न स्वरूपों और उनकी महिमा का वर्णन सुनकर श्रद्धालु भक्ति एवं आध्यात्मिक भाव से जुड़े रहे।
आचार्य डॉ. निलिम्प त्रिपाठी जी ने कहा कि श्रीमद् देवी भागवत महापुराण केवल धार्मिक आख्यान नहीं, बल्कि जीवन को सदाचार, भक्ति, आत्मचिंतन और ईश्वर के प्रति समर्पण की दिशा में प्रेरित करने वाला महत्वपूर्ण ग्रंथ है। इसके श्रवण से मनुष्य को धर्म के मर्म को समझने, अपने आचरण का मूल्यांकन करने और आध्यात्मिक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। देवी की महिमा का स्मरण मनुष्य के भीतर श्रद्धा, विश्वास और सकारात्मकता का संचार करता है। उन्होंने कथा के प्रसंगों के माध्यम से बताया कि सच्ची भक्ति का उद्देश्य केवल सांसारिक सुखों की प्राप्ति नहीं, बल्कि मन की शुद्धि और परम शक्ति के प्रति अटूट विश्वास स्थापित करना भी है।
तीसरे दिन की कथा में मधु और कैटभ नामक असुरों के वध के बाद देवताओं द्वारा किए गए अम्बा यज्ञ का प्रसंग विशेष रूप से प्रस्तुत किया गया। आचार्य जी ने बताया कि देवी भागवत की कथाओं में ऐसे प्रसंगों के माध्यम से यह प्रतिपादित किया गया है कि जब सृष्टि के संतुलन पर संकट उत्पन्न होता है, तब दैवी शक्ति धर्म और व्यवस्था की पुनर्स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। मधु-कैटभ के प्रसंग को आदिशक्ति की महिमा से जोड़ते हुए उन्होंने देवी के उस स्वरूप का वर्णन किया, जो अधर्म के विनाश और धर्म की प्रतिष्ठा का प्रतीक है।
कथा के अनुसार, मधु-कैटभ के वध के उपरांत देवताओं ने मां अम्बा की आराधना और यज्ञ के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त की। इस प्रसंग में देवी की कृपा को समस्त दैवी शक्तियों के मूल आधार के रूप में प्रस्तुत किया गया। आचार्य जी ने श्रद्धालुओं को समझाया कि सनातन परंपरा में यज्ञ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि त्याग, समर्पण, सामूहिक कल्याण और उच्चतर चेतना के प्रति आस्था का प्रतीक भी है। देवी की उपासना में श्रद्धा के साथ शुद्ध भावना, विनम्रता और धर्मसम्मत आचरण का विशेष महत्व है।
ज्ञानयज्ञ के तीसरे दिन का प्रमुख आकर्षण मणि द्वीप की दिव्य कथा रही। आचार्य जी ने श्रीमद् देवी भागवत महापुराण के वर्णन के आधार पर बताया कि किस प्रकार ब्रह्मा, विष्णु और शिव को एक दिव्य, स्वचालित पुष्पक विमान के माध्यम से मणि द्वीप की यात्रा कराई गई। मणि द्वीप को आदिशक्ति के परम दिव्य धाम के रूप में वर्णित किया गया है, जहां मां भुवनेश्वरी का अलौकिक स्वरूप प्रकट होता है। इस प्रसंग के माध्यम से देवी के सर्वोच्च स्वरूप और सृष्टि की समस्त शक्तियों के मूल स्रोत के रूप में उनकी प्रतिष्ठा को समझाया गया।
मणि द्वीप की यात्रा का वर्णन करते हुए आचार्य जी ने बताया कि त्रिदेव के लिए यह प्रसंग देवी तत्त्व के गहन ज्ञान को प्राप्त करने का माध्यम बना। ब्रह्मा, विष्णु और शिव सृष्टि की उत्पत्ति, पालन और संहार से संबंधित शक्तियों के प्रतीक माने जाते हैं, लेकिन देवी भागवत की शक्ति-केंद्रित दृष्टि में इन सभी दैवी कार्यों के मूल में आदिशक्ति की महिमा प्रतिष्ठित है। मां भुवनेश्वरी के दर्शन का प्रसंग इसी आध्यात्मिक सिद्धांत को स्पष्ट करता है कि समस्त सृष्टि की शक्तियां एक व्यापक परम शक्ति से संबद्ध हैं।
आचार्य जी ने मां भुवनेश्वरी के स्वरूप का वर्णन करते हुए त्रिशक्ति के रहस्य को भी विस्तार से समझाया। उन्होंने बताया कि मां काली, मां लक्ष्मी और मां सरस्वती शक्ति के तीन महत्वपूर्ण स्वरूपों के रूप में पूजित हैं। इन स्वरूपों के माध्यम से शक्ति की विविध भूमिकाओं और सृष्टि के अलग-अलग कार्यों को समझा जा सकता है। मां काली शक्ति, परिवर्तन और दुष्ट प्रवृत्तियों के विनाश की प्रतीक हैं। मां लक्ष्मी समृद्धि, ऐश्वर्य, सौभाग्य और जीवन के पोषण से जुड़ी हैं, जबकि मां सरस्वती ज्ञान, विवेक, विद्या और सृजनात्मक चेतना की अधिष्ठात्री मानी जाती हैं।
उन्होंने स्पष्ट किया कि देवी के इन तीनों स्वरूपों को परस्पर विरोधी शक्तियों के रूप में नहीं, बल्कि एक ही परम शक्ति की विविध अभिव्यक्तियों के रूप में समझना चाहिए। जीवन में जहां अन्याय और नकारात्मकता का सामना करने के लिए साहस तथा शक्ति की आवश्यकता होती है, वहीं परिवार और समाज के कल्याण के लिए समृद्धि, सद्भाव और पोषण भी आवश्यक हैं। इसी प्रकार विवेक और ज्ञान के बिना शक्ति तथा संपन्नता का उचित उपयोग संभव नहीं है। इस दृष्टि से काली, लक्ष्मी और सरस्वती की उपासना मनुष्य को शक्ति, समृद्धि और ज्ञान के संतुलित महत्व का बोध कराती है।
मां भुवनेश्वरी के प्राकट्य का प्रसंग श्रद्धालुओं को यह संदेश भी देता है कि परम सत्ता को केवल किसी एक सीमित स्वरूप में नहीं बांधा जा सकता। सनातन धर्म की उपासना परंपरा में एक ही परम तत्त्व को अनेक रूपों में आराध्य माना गया है। भक्त अपनी श्रद्धा, साधना और आध्यात्मिक रुचि के अनुसार देवी के विभिन्न स्वरूपों की आराधना करते हैं, लेकिन इन सभी स्वरूपों के मूल में विद्यमान एकत्व का विचार भी महत्वपूर्ण है। देवी भागवत के प्रसंग इस एकत्व को समझने और भक्ति को व्यापक दृष्टि प्रदान करने का अवसर देते हैं।
आचार्य डॉ. निलिम्प त्रिपाठी जी ने कथा श्रवण के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि देवी भागवत का श्रवण मनुष्य को अपने भीतर झांकने और जीवन के वास्तविक उद्देश्य पर विचार करने की प्रेरणा देता है। ग्रंथ में वर्णित देवी महिमा, दैवी प्रसंग और उपासना के सिद्धांत श्रद्धालुओं को धर्म, करुणा, संयम और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्रदान करते हैं। मनुष्य से जाने-अनजाने में अनेक त्रुटियां हो सकती हैं, लेकिन अपनी भूलों को स्वीकार करना, उनमें सुधार करना और सद्कर्मों की ओर अग्रसर होना आध्यात्मिक जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष है। देवी की आराधना इसी आत्मपरिवर्तन और आंतरिक शुद्धि की भावना को मजबूत करती है।
उन्होंने यह भी बताया कि धार्मिक आयोजनों का महत्व केवल कथा सुनने तक सीमित नहीं रहता। ऐसे आयोजन समाज में आध्यात्मिक चेतना के प्रसार, सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और नई पीढ़ी को भारतीय धार्मिक ग्रंथों से परिचित कराने में भी सहायक होते हैं। जब श्रद्धालु एक स्थान पर एकत्र होकर देवी महिमा का श्रवण करते हैं, तो उनके बीच भक्ति, सद्भाव और सांस्कृतिक जुड़ाव की भावना विकसित होती है। श्रीमद् देवी भागवत महापुराण की कथा इस दृष्टि से व्यक्तिगत साधना के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना का भी माध्यम बनती है।
यह श्रीमद् देवी भागवत महापुराण ज्ञानयज्ञ वेद विद्या मार्तंड ब्रह्मचारी डॉ. गिरीश जी के निर्देशन में संपन्न हो रहा है। आयोजन में मां आदिशक्ति की महिमा से जुड़े विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से श्रद्धालुओं को सनातन धर्म की आध्यात्मिक परंपरा और देवी उपासना के गूढ़ अर्थों से परिचित कराया जा रहा है।
तीसरे दिन की कथा का केंद्रीय संदेश यही रहा कि मां भुवनेश्वरी को आदिशक्ति के परम स्वरूप के रूप में स्मरण करते हुए काली, लक्ष्मी और सरस्वती की शक्तियों के महत्व को जीवन में समझा जाए। शक्ति से अन्याय का सामना करने, लक्ष्मी से प्राप्त समृद्धि का सदुपयोग करने और सरस्वती से प्राप्त ज्ञान के आधार पर विवेकपूर्ण आचरण करने की प्रेरणा ही देवी उपासना की व्यावहारिक सार्थकता है। श्रद्धा जब सदाचार, सेवा और आत्मशुद्धि से जुड़ती है, तभी वह जीवन को सही दिशा प्रदान करती है। मणि द्वीप में मां भुवनेश्वरी के दिव्य दर्शन का प्रसंग इसी व्यापक आध्यात्मिक दृष्टि और आदिशक्ति के प्रति अटूट आस्था का संदेश देता है।
