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आतंकवाद पर दोहरे मानदंड, वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती

राजनाथ सिंह ने आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया।

Few hours ago
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आतंकवाद पर दोहरे मानदंड, वैश्विक सुरक्षा के लिए सबसे बड़ी चुनौती

राजीव त्रिपाठी ✅

ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे में आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) की शासनाध्यक्षों की परिषद की बैठक में भारत ने आतंकवाद के विरुद्ध अपनी दृढ़ नीति दोहराई। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने पाकिस्तान के प्रतिनिधि की मौजूदगी में स्पष्ट किया कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी भी तरह के दोहरे मानदंड स्वीकार नहीं किए जा सकते। भारत का संदेश स्पष्ट था कि आतंकवाद को केवल हथियार उठाने वाले व्यक्तियों या हिंसक घटनाओं तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता, बल्कि इसके पीछे मौजूद आर्थिक सहायता, सुरक्षित ठिकानों, भर्ती नेटवर्क और समर्थन देने वाले पूरे तंत्र को समाप्त करना आवश्यक है।

 

राजनाथ सिंह का यह वक्तव्य ऐसे समय में आया है, जब दक्षिण एशिया में आतंकवाद, सीमा पार सुरक्षा, राजनीतिक अस्थिरता और क्षेत्रीय संपर्क जैसे मुद्दे देशों के आपसी संबंधों को प्रभावित कर रहे हैं। भारत लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर यह मांग करता रहा है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई किसी देश की राजनीतिक सुविधा या रणनीतिक हितों के आधार पर नहीं, बल्कि समान सिद्धांतों के तहत होनी चाहिए। यदि एक स्थान पर निर्दोष नागरिकों की हत्या को आतंकवाद माना जाता है, तो किसी दूसरे स्थान पर वैसी ही हिंसा को राजनीतिक, धार्मिक या वैचारिक आधार पर उचित नहीं ठहराया जाना चाहिए।

 

राजनाथ सिंह ने आतंकवाद के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को समाप्त करने की आवश्यकता पर जोर दिया। इस दृष्टिकोण का महत्व इसलिए अधिक है, क्योंकि आधुनिक आतंकवादी संगठन केवल हथियारों और प्रशिक्षित लड़ाकों के सहारे काम नहीं करते। उनके संचालन में धन जुटाने वाले नेटवर्क, प्रचार तंत्र, भर्ती करने वाले समूह, सुरक्षित ठिकाने, संचार माध्यम और हथियारों की आपूर्ति करने वाले संपर्क भी भूमिका निभा सकते हैं। किसी संगठन के कुछ सदस्यों को गिरफ्तार कर लेने या उसके ठिकानों को नष्ट कर देने से खतरा पूरी तरह समाप्त नहीं होता, यदि उसे दोबारा खड़ा करने वाला तंत्र सक्रिय बना रहे।

 

भारत की चिंता का एक प्रमुख पक्ष यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध वैश्विक नीति में किसी प्रकार की चयनात्मकता नहीं होनी चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों को समर्थन देने, उनके लिए संसाधन जुटाने या उन्हें संरक्षण देने के आरोपों की जांच निष्पक्ष साक्ष्यों के आधार पर होनी चाहिए। जहां ऐसे आरोप प्रमाणित हों, वहां संबंधित व्यक्तियों और संस्थाओं के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की जानी चाहिए। यही दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में जवाबदेही और विश्वसनीयता को मजबूत कर सकता है।

 

आतंकवाद को विकास के लिए गंभीर खतरा बताते हुए राजनाथ सिंह ने यह भी रेखांकित किया कि हिंसा का प्रभाव केवल तत्काल जनहानि तक सीमित नहीं रहता। आतंकवादी घटनाएं व्यापारिक गतिविधियों को बाधित करती हैं, निवेशकों का विश्वास कमजोर करती हैं, पर्यटन को नुकसान पहुंचाती हैं और सरकारों को विकास पर खर्च होने वाले संसाधनों का बड़ा हिस्सा सुरक्षा व्यवस्था पर लगाने के लिए मजबूर करती हैं। जिन क्षेत्रों में लंबे समय तक हिंसा बनी रहती है, वहां रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और आधारभूत ढांचे का विकास भी प्रभावित हो सकता है।

 

इस संदर्भ में आतंकवाद के आर्थिक प्रभाव को समझना जरूरी है। किसी औद्योगिक क्षेत्र, पर्यटन स्थल, परिवहन मार्ग या बाजार में हिंसा की घटना होने पर उसका असर आसपास के कारोबार से लेकर व्यापक अर्थव्यवस्था तक पहुंच सकता है। व्यापारियों को सुरक्षा और बीमा की अतिरिक्त लागत उठानी पड़ती है, आपूर्ति शृंखलाएं बाधित होती हैं और रोजगार के अवसर घट सकते हैं। इसलिए आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई केवल सैन्य या पुलिस संबंधी विषय नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और सामाजिक विकास से भी जुड़ी हुई है।

 

आतंकवाद की चुनौती को समझने के लिए अंतरराष्ट्रीय आंकड़े भी महत्वपूर्ण हैं। इंस्टीट्यूट फॉर इकोनॉमिक्स एंड पीस की ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स 2026 रिपोर्ट के अनुसार, 2025 के आंकड़ों में पाकिस्तान आतंकवाद से सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में पहले स्थान पर रहा। उसका सूचकांक स्कोर 8.574 था। भारत 6.428 के स्कोर के साथ 13वें स्थान पर रहा, जबकि अफगानिस्तान 6.678 के स्कोर के साथ 11वें स्थान पर था।

 

इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ग्लोबल टेररिज्म इंडेक्स किसी देश में आतंकवाद की स्थिति का तुलनात्मक आकलन करता है। यह केवल घटनाओं की संख्या नहीं, बल्कि आतंकवादी गतिविधियों से होने वाली मौतों, घटनाओं और उनके प्रभाव जैसे मानकों को भी ध्यान में रखता है। इसलिए सूचकांक की रैंकिंग को सीधे आतंकवादी घटनाओं की कुल संख्या नहीं माना जाना चाहिए।

 

पाकिस्तान का पहले स्थान पर होना दक्षिण एशिया में आतंकवाद की व्यापक चुनौती को रेखांकित करता है। भारत के लिए यह चिंता सीमा पार आतंकवादी नेटवर्क, जम्मू-कश्मीर में हिंसा और देश के अन्य हिस्सों में संभावित आतंकी खतरों के कारण भी महत्वपूर्ण है। हालांकि, किसी भी देश की जिम्मेदारी तय करने के लिए विशिष्ट घटनाओं, जांच और विश्वसनीय साक्ष्यों का मूल्यांकन आवश्यक है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आंकड़ों का उद्देश्य समस्या की गंभीरता समझना होना चाहिए, न कि बिना प्रमाण किसी निष्कर्ष पर पहुंचना।

 

भारत की सुरक्षा नीति का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आतंकवाद के विरुद्ध कार्रवाई को व्यापक और निरंतर बनाया जाए। इसमें खुफिया सूचनाओं का आदान-प्रदान, संदिग्ध वित्तीय लेनदेन की निगरानी, सीमा सुरक्षा, आतंकवादी संगठनों की भर्ती रोकना और डिजिटल माध्यमों से होने वाले कट्टरपंथी प्रचार का मुकाबला करना शामिल है। आतंकवाद के वित्तपोषण पर रोक लगाने के लिए देशों के बीच सहयोग भी आवश्यक है, क्योंकि धन और संचार के नेटवर्क राष्ट्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं रहते।

 

शंघाई सहयोग संगठन भारत के लिए एक महत्वपूर्ण बहुपक्षीय मंच है। इसमें भारत, चीन, रूस, पाकिस्तान, ईरान, कजाखस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और बेलारूस सहित दस सदस्य देश शामिल हैं। संगठन के सदस्य देशों के सामने सुरक्षा, आतंकवाद, क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार और आर्थिक सहयोग जैसी साझा चुनौतियां हैं। इन देशों के बीच भौगोलिक निकटता और आर्थिक संबंधों के कारण एक देश की अस्थिरता का प्रभाव दूसरे देशों तक भी पहुंच सकता है।

 

एससीओ के माध्यम से सदस्य देश आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने के लिए सूचनाओं के आदान-प्रदान, संयुक्त प्रयासों और सुरक्षा सहयोग को आगे बढ़ा सकते हैं। लेकिन ऐसे सहयोग की सफलता के लिए आपसी विश्वास, पारदर्शिता और सभी देशों की समान प्रतिबद्धता जरूरी है। केवल सम्मेलनों में आतंकवाद की निंदा करना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक परिणाम तभी सामने आएंगे, जब सदस्य देश आतंकवादी नेटवर्क, वित्तीय सहायता और सुरक्षित ठिकानों के विरुद्ध व्यावहारिक कदम उठाएंगे।

 

राजनाथ सिंह ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस संदेश का भी उल्लेख किया, जिसमें एससीओ देशों से सुरक्षा, कनेक्टिविटी और अवसरों के क्षेत्रों में ठोस कदम उठाने का आह्वान किया गया था। ये तीनों विषय परस्पर जुड़े हुए हैं। सुरक्षित क्षेत्रीय वातावरण के बिना व्यापारिक मार्गों और परिवहन नेटवर्क का विस्तार कठिन है। इसी तरह, संपर्क और आर्थिक अवसरों में वृद्धि से रोजगार तथा विकास को बढ़ावा मिल सकता है, जो अस्थिरता से प्रभावित क्षेत्रों में सकारात्मक भूमिका निभा सकता है।

 

भारत मध्य एशिया के साथ व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने में रुचि रखता है। इस दिशा में क्षेत्रीय संपर्क का विशेष महत्व है। हालांकि, भौगोलिक बाधाओं, राजनीतिक मतभेदों और सुरक्षा संबंधी चिंताओं के कारण संपर्क परियोजनाओं को आगे बढ़ाना आसान नहीं है। इसलिए एससीओ में सुरक्षा और कनेक्टिविटी पर एक साथ चर्चा करना क्षेत्रीय सहयोग की व्यावहारिक जरूरत को दर्शाता है।

 

बैठक में पाकिस्तान के प्रतिनिधि की मौजूदगी के बीच राजनाथ सिंह का वक्तव्य कूटनीतिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण रहा। भारत और पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से आतंकवाद तथा सीमा पार सुरक्षा संबंधी विवादों से प्रभावित रहे हैं। ऐसे वातावरण में बहुपक्षीय मंच पर भारत का पक्ष रखना यह दर्शाता है कि नई दिल्ली आतंकवाद के मुद्दे को द्विपक्षीय विवाद तक सीमित रखने के बजाय अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जवाबदेही से जोड़ना चाहती है।

 

भारत का तर्क है कि आतंकवाद के विरुद्ध प्रतिबद्धता का आकलन केवल सार्वजनिक बयानों से नहीं, बल्कि वास्तविक कार्रवाई से किया जाना चाहिए। यदि किसी आतंकवादी संगठन की गतिविधियों, वित्तीय स्रोतों या उसके सदस्यों के नेटवर्क के संबंध में विश्वसनीय जानकारी उपलब्ध होती है, तो संबंधित देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे जांच और कानूनी कार्रवाई में सहयोग करें। ऐसी जवाबदेही सभी देशों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।

 

हालांकि, बहुपक्षीय मंचों पर कड़े वक्तव्यों के साथ संवाद के रास्ते खुले रखना भी जरूरी होता है। आतंकवाद के विरुद्ध साझा नीति बनाने के लिए देशों को राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर सहमति विकसित करनी होगी। खुफिया जानकारी साझा करने, आतंकवादी वित्तपोषण रोकने और अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत संदिग्धों के विरुद्ध कार्रवाई जैसे विषयों पर व्यावहारिक सहयोग अधिक प्रभावी परिणाम दे सकता है।

 

आतंकवाद की चुनौती लगातार बदल रही है। पारंपरिक हिंसक गतिविधियों के साथ ऑनलाइन कट्टरपंथी प्रचार, डिजिटल माध्यमों से संपर्क, धन के नए स्रोत और सीमा पार सक्रिय नेटवर्क सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौतियां पैदा करते हैं। ऐसे में केवल सैन्य कार्रवाई पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है। आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित सुरक्षा बलों, मजबूत खुफिया व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय कानूनी सहयोग को एक साथ आगे बढ़ाना होगा।

 

इसके साथ ही आतंकवाद से प्रभावित क्षेत्रों में शिक्षा, रोजगार, सामाजिक विश्वास और विकास के अवसरों को मजबूत करना भी जरूरी है। हिंसा का मुकाबला करते समय निर्दोष नागरिकों के अधिकारों की रक्षा और कानून के शासन को बनाए रखना किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की जिम्मेदारी है। सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन बनाए रखते हुए ही आतंकवादी संगठनों के प्रभाव को दीर्घकालिक रूप से कम किया जा सकता है।

 

दुशांबे में राजनाथ सिंह का संदेश इसी व्यापक दृष्टिकोण की ओर संकेत करता है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई में किसी देश को सुविधानुसार अलग-अलग मानक अपनाने की छूट नहीं होनी चाहिए। आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम देने वालों के साथ-साथ उन्हें संसाधन, आश्रय और सहायता उपलब्ध कराने वाले नेटवर्क पर भी कानून के अनुरूप कार्रवाई आवश्यक है।

 

एससीओ की बैठक के सामने वास्तविक चुनौती यही है कि आतंकवाद के विरुद्ध व्यक्त की गई प्रतिबद्धताओं को ठोस परिणामों में बदला जाए। क्षेत्रीय शांति, सुरक्षित व्यापार, बेहतर संपर्क और आर्थिक विकास तभी संभव हैं, जब सदस्य देश आतंकवाद को साझा खतरा मानते हुए उसके विरुद्ध प्रभावी सहयोग करें। भारत का स्पष्ट संदेश है कि आतंकवाद किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं हो सकता और उसके विरुद्ध कार्रवाई में दोहरे मानदंडों के बजाय समान जवाबदेही, पारदर्शिता और ठोस कदम आवश्यक हैं।

 

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