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पंजाब में आप के तीन विधायकों की बगावत से बदले चुनावी समीकरण

पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में सरकार बनाने के लिए 59 विधायकों का समर्थन आवश्यक है।

Few hours ago
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पंजाब में आप के तीन विधायकों की बगावत से बदले चुनावी समीकरण

राजीव त्रिपाठी,वरिष्ठ पत्रकार

 

पंजाब में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी के तीन विधायकों का भारतीय जनता पार्टी में शामिल होना प्रदेश की राजनीति में महत्वपूर्ण घटनाक्रम बनकर सामने आया है। अमृतसर उत्तर से कुंवर विजय प्रताप सिंह, समाना से चेतन सिंह जौड़ामाजरा और सनौर से हरमीत सिंह पठानमाजरा ने 2 नवंबर को नई दिल्ली स्थित भाजपा मुख्यालय में पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री भगवंत मान और आम आदमी पार्टी के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल के सामने संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखने की चुनौती खड़ी कर दी है। वहीं भाजपा इसे पंजाब में अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के अवसर के रूप में देख रही है।

 

तीनों नेताओं का पार्टी बदलना ऐसे समय हुआ है, जब आम आदमी पार्टी ने 31 अक्टूबर को आगामी विधानसभा चुनाव के लिए 40 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की थी। इस सूची में तीनों विधायकों के नाम शामिल नहीं थे। हालांकि उनकी विधानसभा सीटों पर भी उम्मीदवार घोषित नहीं हुए थे, इसलिए इसे औपचारिक रूप से टिकट काटे जाने का मामला नहीं कहा जा सकता। इसके बावजूद उम्मीदवार चयन, नेतृत्व के साथ मतभेद और भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को लेकर असंतोष इस घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में दिखाई देता है।

 

कुंवर विजय प्रताप सिंह पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं और अमृतसर की राजनीति में उनकी अलग पहचान रही है। उन्होंने विधानसभा सदस्यता से भी इस्तीफा देने की घोषणा की है। चेतन सिंह जौड़ामाजरा भगवंत मान सरकार में मंत्री रह चुके हैं। सितंबर 2024 के मंत्रिमंडल फेरबदल में उन्हें पद से हटाया गया था। दूसरी ओर हरमीत सिंह पठानमाजरा के भी पार्टी नेतृत्व के साथ संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। ऐसे में तीनों नेताओं का एक साथ भाजपा में जाना अचानक पैदा हुआ विवाद नहीं, बल्कि पहले से चल रहे राजनीतिक मतभेदों का परिणाम माना जा सकता है।

 

पंजाब विधानसभा की कुल 117 सीटों में सरकार बनाने के लिए 59 विधायकों का समर्थन आवश्यक है। वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने ऐतिहासिक प्रदर्शन करते हुए 92 सीटें जीती थीं। कांग्रेस को 18, शिरोमणि अकाली दल को तीन, भाजपा को दो, बहुजन समाज पार्टी को एक और निर्दलीय उम्मीदवार को एक सीट मिली थी। आम आदमी पार्टी को लगभग 42.01 प्रतिशत मत प्राप्त हुए थे। कांग्रेस का मत प्रतिशत 22.98, अकाली दल का 18.38 और भाजपा का 6.60 प्रतिशत रहा था। इन परिणामों ने पंजाब की परंपरागत द्विदलीय प्रतिस्पर्धा को बदलकर नई राजनीतिक व्यवस्था स्थापित की थी।

 

हालांकि 2024 के लोकसभा चुनाव में विधानसभा चुनाव से अलग तस्वीर सामने आई। पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में कांग्रेस ने सात, आम आदमी पार्टी ने तीन, अकाली दल ने एक और निर्दलीय उम्मीदवारों ने दो सीटें जीतीं। भाजपा को कोई लोकसभा सीट नहीं मिली, लेकिन उसका मत प्रतिशत बढ़कर लगभग 18.56 प्रतिशत पहुंच गया। कांग्रेस को लगभग 26.31 प्रतिशत, आम आदमी पार्टी को 26.03 प्रतिशत और अकाली दल को 13.41 प्रतिशत मत मिले। विधानसभा और लोकसभा चुनावों की परिस्थितियां अलग होने के बावजूद ये आंकड़े संकेत देते हैं कि राज्य में राजनीतिक प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक खुली हुई है।

 

लोकसभा चुनाव के विधानसभा क्षेत्रवार मतों का विश्लेषण भी महत्वपूर्ण है। वर्ष 2022 में 92 सीटें जीतने वाली आम आदमी पार्टी 2024 के संसदीय चुनाव में केवल 33 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही। कांग्रेस को 37 और भाजपा को 23 विधानसभा क्षेत्रों में बढ़त मिली। अकाली दल नौ तथा निर्दलीय उम्मीदवार 15 क्षेत्रों में आगे रहे। हालांकि ये वास्तविक विधानसभा चुनाव परिणाम नहीं थे और इन्हें 2027 की सीटों का पूर्वानुमान मानना उचित नहीं होगा। फिर भी इनसे स्पष्ट होता है कि आम आदमी पार्टी के लिए 2022 जैसी व्यापक राजनीतिक बढ़त बनाए रखना आसान नहीं है।

 

भाजपा के लिए पंजाब का चुनाव विशेष महत्व रखता है। वर्ष 2022 में पार्टी ने 73 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़कर केवल दो सीटें जीती थीं। इसके विपरीत 2024 के लोकसभा चुनाव में उसने सभी 13 संसदीय क्षेत्रों में उम्मीदवार उतारे और अपना मत प्रतिशत उल्लेखनीय रूप से बढ़ाया। अब तीन मौजूदा विधायकों की पृष्ठभूमि वाले नेताओं के शामिल होने से पार्टी को अमृतसर और पटियाला क्षेत्र में स्थानीय राजनीतिक नेटवर्क मजबूत करने का अवसर मिल सकता है। हालांकि नेताओं के आने से उनके समर्थकों का पूरा मतदान आधार भी भाजपा को स्थानांतरित होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है।

 

पंजाब की क्षेत्रीय राजनीति में मालवा, माझा और दोआबा की अलग-अलग भूमिका है। मालवा क्षेत्र में विधानसभा की 69 सीटें हैं, जो कुल सीटों का लगभग 59 प्रतिशत हैं। वर्ष 2022 में आम आदमी पार्टी ने मालवा की 66 सीटें जीतकर अपनी ऐतिहासिक विजय का आधार तैयार किया था। समाना और सनौर इसी महत्वपूर्ण क्षेत्र में आते हैं। इसलिए इन दोनों सीटों के विधायकों का भाजपा में जाना क्षेत्रीय दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाएगा। दूसरी ओर अमृतसर उत्तर माझा क्षेत्र में स्थित है, जहां भाजपा अपनी संगठनात्मक उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास कर रही है।

 

कांग्रेस के लिए भी बदलती परिस्थितियां राजनीतिक अवसर पैदा कर सकती हैं। लोकसभा चुनाव में सात सीटें जीतकर कांग्रेस ने साबित किया था कि राज्य में उसका परंपरागत जनाधार पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। पार्टी की चुनौती संगठनात्मक एकजुटता, स्थानीय नेतृत्व और मुख्यमंत्री पद की संभावित दावेदारी को लेकर संतुलन बनाए रखने की होगी। यदि कांग्रेस आंतरिक गुटबाजी नियंत्रित करने में सफल रहती है, तो वह सत्ता विरोधी मतों की प्रमुख दावेदार बन सकती है। लेकिन यदि विपक्षी मत भाजपा, कांग्रेस और अकाली दल के बीच बंटते हैं, तो इसका लाभ आम आदमी पार्टी को भी मिल सकता है।

 

शिरोमणि अकाली दल की भूमिका को भी कम नहीं आंका जा सकता। पार्टी को 2022 में केवल तीन विधानसभा सीटें मिली थीं, लेकिन उसका मत प्रतिशत 18 प्रतिशत से अधिक रहा था। लोकसभा चुनाव में उसका समर्थन घटा, फिर भी पंजाब के ग्रामीण और पंथक राजनीतिक क्षेत्रों में उसका ऐतिहासिक प्रभाव बना हुआ है। भाजपा और अकाली दल के बीच भविष्य में किसी चुनावी समझौते की संभावना राजनीतिक चर्चा का विषय है, लेकिन किसी गठबंधन को औपचारिक घोषणा से पहले निश्चित नहीं माना जा सकता। दोनों दलों के साथ आने या अलग चुनाव लड़ने से अनेक सीटों पर मुकाबले का स्वरूप बदल सकता है।

 

आम आदमी पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने लगभग पांच वर्ष के शासन का मूल्यांकन है। वर्ष 2022 में पार्टी ने भ्रष्टाचार पर नियंत्रण, सरकारी सेवाओं में सुधार, शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, रोजगार तथा नशे के विरुद्ध प्रभावी कार्रवाई के वादों के आधार पर जनादेश प्राप्त किया था। सरकार अपने कार्यकाल में शुरू की गई जनकल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक सुधारों को उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है। वहीं विपक्ष कानून व्यवस्था, नशे के कारोबार, बेरोजगारी और वित्तीय स्थिति को लेकर सवाल उठा रहा है। आगामी चुनाव में मतदाता इन दावों का मूल्यांकन अपने स्थानीय अनुभव और सरकारी कामकाज के आधार पर करेंगे।

 

राज्य की वित्तीय स्थिति भी चुनावी विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। पंजाब के 2026-27 के बजट में सकल राज्य घरेलू उत्पाद लगभग 9.81 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान है। ऋण भुगतान को छोड़कर सरकारी व्यय 1,66,711 करोड़ रुपये प्रस्तावित है। राजकोषीय घाटा 39,971 करोड़ रुपये अर्थात जीएसडीपी का 4.1 प्रतिशत अनुमानित है। वर्ष के अंत तक कुल बकाया देनदारियां जीएसडीपी के लगभग 45.1 प्रतिशत तक पहुंचने का अनुमान है। ये आंकड़े बताते हैं कि जनकल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के साथ वित्तीय अनुशासन बनाए रखना सरकार के लिए गंभीर चुनौती है।

 

सरकार ने महिलाओं के लिए प्रस्तावित आर्थिक सहायता योजना पर 9,300 करोड़ रुपये का बजटीय प्रावधान किया है। इस योजना में पात्र सामान्य वर्ग की महिलाओं के लिए प्रतिमाह 1,000 रुपये तथा अनुसूचित जाति की महिलाओं के लिए 1,500 रुपये सहायता प्रस्तावित है। इसके अतिरिक्त शिक्षा क्षेत्र में सुधार और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार पर भी जोर दिया गया है। राजनीतिक दृष्टि से इन योजनाओं का प्रभाव उनके वास्तविक क्रियान्वयन, लाभार्थियों तक पहुंच और वित्तीय निरंतरता पर निर्भर करेगा।

 

पंजाब में मतदाता संख्या भी चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण है। अक्टूबर 2026 में प्रकाशित अंतिम मतदाता सूची के अनुसार राज्य में 2,01,00,727 पंजीकृत मतदाता हैं। विशेष गहन पुनरीक्षण के बाद पूर्ववर्ती सूची की तुलना में लगभग 13.60 लाख मतदाताओं की शुद्ध कमी दर्ज हुई। चुनाव आयोग ने राज्य में मतदान केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 25,332 की है। ऐसी परिस्थितियों में मतदाता सूची की शुद्धता, नए मतदाताओं का पंजीकरण और मतदान प्रतिशत सभी राजनीतिक दलों की तैयारी को प्रभावित करेंगे। पंजाब की 34 अनुसूचित जाति आरक्षित विधानसभा सीटें भी चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा रहेंगी।

 

आम आदमी पार्टी के लिए राहत का पहलू यह है कि लोकसभा चुनाव में अपेक्षाकृत कमजोर प्रदर्शन के बावजूद नवंबर 2024 के चार विधानसभा उपचुनावों में पार्टी ने तीन सीटें जीती थीं। इसने संकेत दिया था कि संसदीय चुनाव का परिणाम सीधे विधानसभा चुनाव की राजनीतिक स्थिति निर्धारित नहीं करता। मुख्यमंत्री भगवंत मान का स्थानीय जनसंपर्क और पार्टी की बूथ स्तर की सक्रियता आने वाले महीनों में निर्णायक साबित हो सकती है।

 

दूसरी ओर भाजपा को मत प्रतिशत में वृद्धि को वास्तविक विधानसभा सीटों में बदलने की चुनौती का सामना करना होगा। तीन नेताओं के शामिल होने से पार्टी को प्रचार और संगठन में सहायता मिल सकती है, लेकिन पंजाब में सरकार बनाने के लिए व्यापक क्षेत्रीय स्वीकार्यता, मजबूत स्थानीय उम्मीदवार और स्पष्ट विकास कार्यक्रम आवश्यक होंगे। कांग्रेस को अपनी चुनावी बढ़त बनाए रखनी होगी, जबकि अकाली दल अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता पुनः स्थापित करने का प्रयास करेगा।

 

अंततः तीन विधायकों का भाजपा में जाना आम आदमी पार्टी के लिए केवल संख्यात्मक क्षति नहीं, बल्कि चुनाव से पहले संगठनात्मक अनुशासन और नेतृत्व पर भरोसे की परीक्षा है। फिर भी तीन नेताओं के दल बदलने से पूरे प्रदेश के मतदाताओं का राजनीतिक रुख तय नहीं होता। वर्ष 2027 का चुनाव इस बात पर निर्भर करेगा कि कौन-सा दल पंजाब के युवाओं, किसानों, महिलाओं, कर्मचारियों और शहरी मतदाताओं को विश्वसनीय भविष्य का भरोसा दिला पाता है। पंजाब की राजनीति अब एकतरफा जनादेश से निकलकर बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जहां गठबंधन, उम्मीदवारों की विश्वसनीयता और शासन का वास्तविक प्रदर्शन सत्ता का अंतिम फैसला करेंगे।

 

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