वोट बेचकर विकास की उम्मीद, फिर कर्मों को क्यों दोष दें
हमारी सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम तत्काल लाभ को भविष्य के लाभ से बड़ा मान लेते हैं।

भारती वर्मा
TGT हिंदी, दिल्ली
दोस्तों, मुझे एक पुरानी कहावत याद आ गई—“छन्नी में दूध छानना और कर्मों को रोना!” अब हमारे कुछ नौजवान भाई सोच रहे होंगे कि भला छन्नी में दूध कौन छानता है? अरे भाई, आज के जमाने में दूध छानने के लिए तो फिल्टर, मशीन और न जाने कितने आधुनिक उपकरण आ गए हैं, लेकिन जिंदगी में हम आज भी कई बार छन्नी लेकर खड़े हो जाते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि दूध बचा ही नहीं। चुनाव के समय भी हमारी स्थिति कुछ ऐसी ही हो जाती है। कोई हमें 500 रुपये की पत्ती दिखा देता है, कोई मुफ्त की बोतल, कोई मुर्गे की प्लेट, कोई राशन की बोरी और कोई छोटी-बड़ी सुविधा का लालच। हम तत्काल लाभ देखकर अपना सबसे बड़ा अधिकार—अपना वोट—उसके हवाले कर देते हैं। फिर चुनाव खत्म होते ही पांच साल तक छन्नी हाथ में लेकर दूध ढूंढते रहते हैं।
अब जरा सोचिए, छन्नी में बारीक-बारीक छेद होते हैं। उसमें दूध डालिए तो दूध रुकने वाला नहीं है। वह नीचे बह जाएगा। ऊपर से छन्नी बिल्कुल साफ-सुथरी दिखाई देगी, लेकिन उसमें दूध नहीं बचेगा। हमारे लोकतंत्र में भी वोट अगर सोच-समझकर नहीं दिया गया, तो उसका परिणाम कुछ ऐसा ही होता है। वोट डालते समय हमें लगता है कि हमने बहुत बड़ा काम कर लिया। अंगुली पर स्याही लगी, फोटो खिंच गई, सोशल मीडिया पर पोस्ट भी डाल दी और शाम तक भूल गए कि हमने पांच साल के भविष्य का फैसला किया है। जब सड़क टूटती है, नाली जाम होती है, अस्पताल में डॉक्टर नहीं मिलता, स्कूल में शिक्षक कम पड़ते हैं, रोजगार का संकट बढ़ता है और सरकारी दफ्तर में काम के लिए चक्कर लगाने पड़ते हैं, तब अचानक हमारी याददाश्त लौटती है और हम कहते हैं—“साहब, हमारे नेता ने तो कुछ किया ही नहीं!”
भाई साहब, सवाल यह है कि नेता को चुनते समय आपने क्या देखा था? उसके काम को देखा था या उसके हाथ में पकड़ी हुई पत्ती को? उसके पिछले कार्यकाल का हिसाब देखा था या चुनावी मंच पर लगाए गए नारे? उसके चरित्र और क्षमता को परखा था या जाति, धर्म, रिश्तेदारी और व्यक्तिगत लाभ को? अगर आपने वोट देते समय केवल यह देखा कि आज मुझे क्या मिल रहा है, तो कल की परेशानी पर केवल नेता को दोष देना भी पूरी तरह उचित नहीं होगा। लोकतंत्र में नेता अकेला जिम्मेदार नहीं होता, मतदाता भी अपनी पसंद के लिए जिम्मेदार होता है।
इसी पर मुझे एक मजेदार किस्सा याद आता है। एक आदमी भगवान के पास जाकर रोने लगा—“हे भगवान! मेरी किस्मत इतनी खराब क्यों है? नेता जी ने एक भी वादा पूरा नहीं किया। हमारे गांव की सड़क आज भी टूटी है, अस्पताल में डॉक्टर नहीं है और बच्चों के स्कूल में शिक्षक नहीं हैं।” भगवान ने मुस्कुराकर पूछा—“बेटा, चुनाव के समय तुमने वोट किस आधार पर दिया था?” आदमी बोला—“भगवान जी, नेता जी ने मुझे 500 रुपये दिए थे और साथ में मुर्गे की प्लेट भी।” भगवान हंसकर बोले—“बेटा, उस समय तुम्हारी किस्मत मैं नहीं, वही मुर्गा लिख रहा था!” आदमी ने सिर पकड़ लिया। अब अगर बात सीधे दिल तक पहुंच गई हो तो तालियां बजाने में कोई हर्ज नहीं है, लेकिन तालियां बजाने से ज्यादा जरूरी है कि अगली बार वोट डालते समय दिमाग भी साथ लेकर जाएं।
हमारी सबसे बड़ी समस्या यही है कि हम तत्काल लाभ को भविष्य के लाभ से बड़ा मान लेते हैं। पांच सौ रुपये आज मिल गए तो हमें लगता है कि चुनाव सफल हो गया। लेकिन पांच साल में महंगाई, बेरोजगारी, खराब सड़क, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और शिक्षा की कमी के रूप में जो नुकसान होता है, उसका हिसाब कौन लगाएगा? पांच सौ रुपये की कीमत कुछ दिनों की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन एक गलत जनप्रतिनिधि का चुनाव पूरे क्षेत्र की विकास यात्रा को वर्षों पीछे कर सकता है। इसलिए वोट की कीमत किसी नोट से नहीं लगाई जा सकती। वोट वह निर्णय है जो आने वाली पीढ़ियों के जीवन को प्रभावित करता है।
कई बार हम कहते हैं कि “हमारे एक वोट से क्या फर्क पड़ेगा?” यही सोच लोकतंत्र की सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है। एक-एक बूंद से समुद्र बनता है और एक-एक वोट से सरकारें बनती हैं। किसी चुनाव में जीत और हार का अंतर कुछ हजार, कुछ सैकड़ों या कभी-कभी कुछ वोटों तक रह जाता है। ऐसे में हर मतदाता का निर्णय महत्वपूर्ण हो जाता है। इसलिए यह कहना कि “मेरे एक वोट से क्या होगा” अपने अधिकार की ताकत को कम समझना है।
हमें यह भी समझना होगा कि नेता को चुनना किसी रिश्तेदार को खुश करने जैसा काम नहीं है। यह नौकरी देने जैसा है। जिस तरह हम अपने घर में काम करने वाले व्यक्ति से उसके काम का हिसाब मांगते हैं, उसी तरह जनप्रतिनिधि से भी उसके काम का हिसाब मांगना चाहिए। उसने क्षेत्र में कितनी सड़कें बनवाईं, स्कूलों की स्थिति में क्या सुधार हुआ, अस्पतालों में क्या व्यवस्था बनी, रोजगार के लिए क्या प्रयास हुए, पानी और बिजली की समस्या कितनी कम हुई, सरकारी योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों तक कितना पहुंचा—इन सवालों के जवाब जनता को मांगने चाहिए।
हमारे यहां एक और आदत है। चुनाव के समय नेता को भगवान बना देते हैं और चुनाव के बाद उसी नेता को कोसते रहते हैं। यह दोनों ही अतियां ठीक नहीं हैं। नेता न भगवान है और न शत्रु। वह जनता का प्रतिनिधि है। उसे उसके काम के आधार पर परखना चाहिए। यदि काम अच्छा है तो समर्थन दीजिए और यदि काम खराब है तो लोकतांत्रिक तरीके से बदलाव कीजिए। लेकिन चुनाव के समय जाति, लालच, डर, अफवाह या व्यक्तिगत लाभ के आधार पर फैसला करके बाद में व्यवस्था को दोष देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है।
हमें अपने बच्चों को भी लोकतंत्र की यह समझ देनी होगी। उन्हें यह बताना होगा कि वोट केवल छुट्टी का दिन नहीं है। यह नागरिक जिम्मेदारी है। जिस देश में लोग अपने मताधिकार का उपयोग केवल मुफ्त की वस्तु पाने के लिए करेंगे, वहां लोकतंत्र की गुणवत्ता कमजोर होगी। लेकिन जिस देश का मतदाता उम्मीदवार से सवाल पूछेगा, उसके काम को देखेगा और भविष्य की योजनाओं को समझेगा, वहां व्यवस्था को बेहतर होने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
यह भी जरूरी है कि हम चुनावी लालच को केवल गरीब मतदाता की कमजोरी मानकर उसका मजाक न उड़ाएं। गरीबी और जरूरत का फायदा उठाकर वोट खरीदने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गंभीर चुनौती है। लेकिन मतदाता को भी अपने विवेक की रक्षा करनी होगी। आज का छोटा लाभ कल के बड़े नुकसान का कारण न बने, यह समझना जरूरी है। पांच सौ रुपये लेकर यदि पांच साल की सुविधाएं खो दीं, तो सौदा किसके पक्ष में हुआ, यह समझने के लिए किसी गणितज्ञ की जरूरत नहीं।
हम अक्सर कर्म और किस्मत की बातें करते हैं। कहते हैं कि “मेरी किस्मत ही खराब है।” लेकिन हर बार किस्मत को दोष देना भी आसान रास्ता है। जीवन में हमारी अपनी पसंद और निर्णय भी परिणाम पैदा करते हैं। यदि हमने गलत व्यक्ति को चुना, गलत जानकारी पर विश्वास किया या बिना जांचे किसी के वादे पर भरोसा किया, तो हमें अगली बार अपनी गलती सुधारने का साहस भी रखना चाहिए। लोकतंत्र में गलती स्थायी नहीं होती, यदि मतदाता अपनी गलती से सीखने को तैयार हो।
इसलिए अगली बार जब चुनाव आए और कोई आपके सामने नोट, सामान, शराब, भोजन या किसी अन्य लालच का प्रस्ताव रखे, तो एक क्षण के लिए अपने बच्चों का भविष्य, अपने गांव की सड़क, अपने शहर का अस्पताल, अपने क्षेत्र के स्कूल और अपने देश की दिशा याद कीजिए। खुद से पूछिए कि क्या इतनी छोटी कीमत पर इतना बड़ा अधिकार देना उचित है? आपका वोट केवल आज का फैसला नहीं है। यह आने वाले वर्षों की व्यवस्था का आधार है।
तो अगली बार जब आपके हाथ में “वोट की छन्नी” आए, तो उसमें दूध डालने से पहले यह जरूर देखिए कि छन्नी में छेद कितने हैं। कहीं ऐसा न हो कि आपका कीमती वोट भी उन्हीं छेदों से बह जाए और पांच साल बाद हम फिर बैठकर अपने कर्मों और किस्मत का रोना रोते रहें।
हंसिए, मुस्कुराइए और व्यंग्य को समझिए, लेकिन वोट के समय गंभीर हो जाइए। क्योंकि लोकतंत्र में जनता केवल शिकायत करने वाली नहीं, फैसला करने वाली शक्ति भी है। सही फैसला किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरे समाज और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य बदल सकता है। इसलिए वोट को कीमत मत बनाइए, उसे अपनी आवाज बनाइए। लालच के सामने विवेक को मत हारिए। उम्मीदवार को उसके काम, सोच, ईमानदारी, क्षमता और जनता के प्रति जवाबदेही के आधार पर परखिए। फिर यदि परिणाम अच्छे आएं तो गर्व से कह सकेंगे कि हमने अपना भविष्य किसी लालच के हाथों नहीं, अपने विवेक के हाथों सौंपा है।
आप सभी ने मुझे इतने ध्यान से सुना, उसके लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। हंसते रहिए, सोचते रहिए और अपने अधिकार का सही इस्तेमाल करते रहिए।
