सुप्रीम कोर्ट ने भोपाल शाही परिवार की संपत्ति विवाद से जुड़े मध्यप्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें मामला पुनः भोपाल की निचली अदालत को भेजा गया था। यह विवाद भोपाल के अंतिम नवाब हमीदुल्ला खान की संपत्तियों से जुड़ा है। 1962 में उनकी बेटी साजिदा सुल्तान — जो अभिनेता सैफ अली खान की दादी थीं — को अकेली वारिस घोषित किया गया था। अब नवाब के भाइयों और अन्य रिश्तेदारों के वंशज इस दावे को चुनौती दे रहे हैं।
याचिका में क्या कहा गया है?
8 अगस्त को जस्टिस पी. एस. नरसिम्हा और जस्टिस अतुल चंदुरकर की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाते हुए नोटिस जारी किया। अपील ओमर फारूक अली और राशिद अली (नवाब ओबैदुल्ला खान के वंशज) ने दायर की है। उनके वकील आदिल सिंह बोपराई ने कहा कि हाईकोर्ट ने 30 जून के फैसले में तालत फातिमा (रामपुर) मामले के सिद्धांत को दोहराया कि नवाब की संपत्तियाँ मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार वारिसों में बंटनी चाहिए।
हालांकि, इस सिद्धांत को मान्यता देने के बावजूद, हाईकोर्ट ने मामला गलत तरीके से फिर से विचार हेतु ट्रायल कोर्ट को भेज दिया। मौजूदा याचिका इसी पुनर्विचार आदेश को चुनौती देती है।
न्यायिक इतिहास
2019 में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला दिया था कि रामपुर नवाबी संपत्ति तालत फातिमा मामले में मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार सभी वारिसों में बंटेगी।
मप्र हाईकोर्ट ने 14 फरवरी 2000 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया था, जिसमें केवल नवाब की बेटी साजिदा सुल्तान, उनके बेटे दिवंगत क्रिकेटर मंसूर अली खान पटौदी और उनके वारिस — सैफ अली खान, सोहा अली खान, सबा सुल्तान और अभिनेत्री शर्मिला टैगोर — को विशेष अधिकार दिया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट का यह निर्णय 1997 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश पर आधारित था, जिसे 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने पलट दिया था। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने मामला ट्रायल कोर्ट को पुनर्विचार के लिए भेजा।
विवाद का एक और पहलू
2015 में सरकार ने हमीदुल्ला खान की सबसे बड़ी बेटी अबीदा सुल्तान की संपत्तियाँ अपने कब्जे में ले ली थीं, क्योंकि वह पाकिस्तान चली गई थीं। भारत में उनकी संपत्तियों को ‘शत्रु संपत्ति’ घोषित किया गया।
जबलपुर के वकील राजेश कुमार पंचोली (पटौदी परिवार के पूर्व अधिवक्ता) ने बताया कि 1972 में इस विवाद में 20 से अधिक दावेदार थे। 2019 के रामपुर केस ने सभी वारिसों (महिलाओं सहित) को हिस्सा देने की बात कही थी, लेकिन पंचोली का कहना है कि यह निर्णय भोपाल पर पूरी तरह लागू नहीं हो सकता, क्योंकि 1972 से अब तक भोपाल, सीहोर और रायसेन में फैली कई नवाबी संपत्तियाँ बिक चुकी हैं या अन्य लोगों के कब्जे में हैं।
फिलहाल, हाईकोर्ट ने मामले के अंतिम निपटारे तक किसी भी नई बिक्री या ट्रांसफर पर रोक लगा रखी है।